Saturday, September 11, 2010

मेरे पिता जी स्वर्गीय विजय प्रसाद की कविताएं

श्री गणेशाय नमः


ब्लागर के सभी पाठकों को अजय साहनी की तरफ से गणेश चतुर्थी कि और इद्द  कि हार्दिक शुभ कामना  स्वीकार हो.
मै कोई लेखक नहीं और न ही कोई कलाकार हूँ .
पर साहित्य हिन्दुस्तानी जैसे ब्लॉग को पढता हूँ
तो मन में एक हुक सी उठती है कि काश मै भी
कुछ लिखता और अपनी भावनाएं लोगों को बताता
पर समय नहीं मिलता है कि कुछ करूँ ,
क्योकि पेट है पापी बड़ा कहता है पहले मुझे देखो जिंदगी में और भी दिन आयेंगे कुछ करने के ,
                                                         देखा आपने फिर से रूकावट आ गयी खैर अभी नहीं तो फिर कभी पर
                                                         एक दिन जरुर ही मै अपनी जिंदगी की कहानी जरुर आप लोगों को पधाऊंगा और अपने स्वर्गीय पिता श्री विजय प्रसाद की लिखी एक कविता जो वीर साराभा पर उन्होंने लिखी थी और पांचजन्य साप्ताहिक में छपने को भेजी भी थी पर पांचजन्य के संपादक महोदय ने उसे यह कह कर वापस कर दिया था कि बहुत लम्बी कविता है उसे आप सब के सामने अवश्य प्रस्तुत करूँगा .वैसे मै भी लिखता तो हूँ पर उसका कोई लेबल नहीं है .इंडिया ऐरैसके नाम एक ब्लॉग लिकता था पर उसको अपडेट रख नहीं पा रहा हूँ . अजय सहानी ११-०९-2010
स्वर्गीय विजय प्रसाद (जन्म -१ जनवरी 1941 देहावसान  १४ मई २००४)
   १२-०९-२०१०
मेरे पिता जी स्वर्गीय विजय प्रसाद  मेरे पिता जी एक बहुत अच्छे व्यक्ति थे उनका जन्म १९४१ को मऊ जिले के शहरोज जिले में हुआ था , उनकी आरंभिक शिक्षा गाँव के प्राइमरी स्कूल में ही हुई , मेरे बाबा जी स्वर्गीय मनमोहित प्रसाद शास्त्री  महात्मा गाँधी के उन गिने चुने गुप्त सहयोगियों में से थे जो गरम दल को सहयोग और गुप्त सहायता देते थे , वह घर से हमेशा दूर ही रहते थे , पिता जी की शिक्षा के लिए बाबा जी ने उनको कोपागंज के  इंटर कालेज में एडमिट करा दिया ,
पिता जी ने वंही पर अपनी शिक्षा इंटर तक की और इधर १९४७ में देश आजाद हो गया और देश का विभाजन भी हो गया गाँधी जी की मृत्यु के बाद बाबा जी मेरठ आ गए और गाँधी अश्श्रम में काम करने लगे . उन दिनों गाँधी आश्रम की स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी तो बाबा जी गाँधी आश्रम के हर सेंटरों पर जाकर उसके लिए काम जमाते गए ,बुलंदशहर में आ बाबा ने पिता जी और मेरे चाचा अवधेश व मेरी दादी को वंही बुला लिया , यंही  पिता जी ने पहले रेलवे में टी टी के लिए आवेदन किया और तेलिग्राफिस्ट के लिए भी आवेदन किया था और दूर संचार विभाग में चुन लिए गए वंहा से बाबा मेरठ आ गए और पिता जी ट्रेनिंग के लिए आगरा चले गए पिता जी के अन्दर कविता का शौक  तभी पड़ा होगा .
क्योकि तब पिता जी अक्सर मेरठ बाबा के पास आते जाते  थे उनकी उस समय की एक कविता में उनके कई जगहों पर आने जाने का विवरण है भी . उनकी एक कविता करतार सिंह साराभा है जो लम्बी तो है पर अपने आप में अद्भुत है :-
                                                               करतार सिंह साराभा 
करतार सिंह साराभा 
भगत सिंह 
करतार सिंह साराभा की चर्चा अक्सर भगत सिंह जयदेव जी और शिव वर्मा जी से करते रहते थे देखें शिव वर्मा की पुस्तक स्मृतियाँ के अध्याय भगत सिंह का २१वां पृष्ठ 
करतार सिंह साराभा 
रचयिता स्वर्गीय विजय प्रसाद  प्रस्तुत कर्ता अजय साहनी 
दिनांक - १०.१०.२०१० 

उठो लेखनी नमन करोतुम भारत के उन वीरों को 
उन वीरों को और मनीषी छत्री वीर रणधीरों को 

जिन जिन कुल में जन्म लिए उन अमर कोख को नमन करो 
सुप्त पड़ा इतिहास कि ऐसी मात्र शक्ति को नमन करो
 तुम भी गाती कीर्ति उन्ही कि जिनको गाता है इतिहास
चलो आज कुछ नया लिखें हम जिन पर गर्व करे इतिहास !

माता जीजाबाई को तुम नमन करो सत बार नमन 
जिनके आदर्शों को पाए  लक्छ वीर को नमन नमन
 नमन करो ऋषि दयानंद को जिनके मानस पुत्रों ने 
गत एक शती का लिख डाला इतिहास सुनहरे पृष्ठों में

लाला हरदयाल एम ए औ भाई परमानन्द सामान 
गौरव स्वातंत्र्य युद्ध में ,आहुति डालें वीर महान
 ऐसी वीरों कि लड़ियों में अपना नायक खोजे हम 
जिसने केवल बसंत पंद्रह में देखा फंसी का दम !!

 वीर भूमि पंजाब चलें हम और स्थान साराभा में 
  वँही तुम्हारा वीर विप्लवी जन्मा ग्राम साराभा में  
       वीर हुआ करतार सिंह औ नाम उपाख्य "साराभा" था
बलिदानी गुरुओं के पग पे हुआ शहीद साराभा था 

बनी ग़दर पार्टी विदेश में भारत माँ के चिंतन में 
किन्तु किया साफल्य दूर फिर जयचंदों चिंतन ने 
 मुक्तिदूत बन गए फिरंगी , ब्रिटिश राज्य के संकुल में 
सहे यातना झूम झूम के फिर झाँसी के चंगुल में 
   
करतार सिंह था अपरिपक्व फिर फंसी कि थी आयु नहीं
धिक्कार है गोरी ब्रिटिश कौम जो इसा कि भी हो न सकी 
 रूप रंग कि वसुधा पर पर्मात्व्देव ने नहीं रचा
कामदेव सा रूपकल्प वह नहीं साराभा सा देखा 

हाँ तो जब गोरे न्यायिक ने देखा तो पलक न बंद हुई 
वह बाजरा ह्रदय चीत्कार उठा फांसी न ना ना कभी नहीं 
 फिर याद आया कर्त्तव्य बोध संस्कारजनित मर्यादा का 
तब अट्टहास कर पशुता ने कर दिया अंत मर्यादा का 

जो अनुपमेय था रूप अभी पंद्रह बसंत का सौम्य शिष्ट 
अब फांसी मुकुट पिन्हाएगी वह चूमेगा हो एकनिष्ट 
फांसी का आदेश दे दिया पर अनुताप ना सहन हुआ 
और साराभा से मिलाने वह न्यायिक आतुर तुरत हुआ 

कारगर में हो प्रविष्ट  करतार सिंह से  वह बोला
मैंने ही तुमको फांसी दी है याद तुम्हे क्या वह बोला 
जैसे ही सुना साराभा ने हो व्यंग मुखर निज अंतर्मन 
फांसी से क्या कुछ शेष बचा? जो तुमने कष्ट किया श्रीमन!

मै तो एक पंख कटा पक्षी बस गर्दन शेष बची मेरी 
छड़भंगुर का वक्तित्व आज क्या अब भी शेष रहा बैरी 
विश्वास रखें कोई अनिष्ट इस अंत समय होने से रहा 
प्रभु से मिलने कि चाहत में मन चंचरीक सा भटक रहा 

कब मिले मृत्यु यह तज शरीर प्रभु के चरणों में खेलूं मैं
बस इसी अभीप्सित तृष्णा से विश्वास करे बोझिल हूँ मैं 
बोला न्यायिक अनुतापित हो है नहीं नहीं यह बात नहीं
तुमको कल मृत्यु वरण कर ले अभी तुम्हारी आयु नहीं 

यह दिव्य शरीर दिया प्रभु ने शुख भोग हेतु इस पृथ्वी पर 
फिर तुमसा यह लावण्य रूप व्यक्तित्व नष्ट हो यों क्यों कर 
मेरी तो यही अभीप्सा है तुम मादान  के लिए लिखो
फिर शेष आयु इस धरती पर सुख सौरव्य भोग कर जियो मरो 

जीवन के प्रति यह विचार सुन तुरत साराभा मुस्काया 
यह भेद समझ से परे रहा देखा ना पढ़ा  ना सुन पाया 
बोला हे भद्र सुनो मेरी यह मृत्यु व्यर्थ क्यों जाएगी 
सर बांध कफ़न अनगिनित शूरवीरों कि टोली आएगी

मृत्युंजय कि है पंक्ति लगी क्यों पीछे पग खींचूँ अपना 
परमेश्वर कि इच्छानुसार इहलीला अंत करूँ अपना 
इतना कहते मुखमंडल कि आभा द्विगुणित हो उठी तभी 
जैसे उषा के सूर्यदेव नभ से आये हों उतर तभी ...............
इस कविता कि पोस्टिंग  आगे भी जारी रहेगी  अजय साहनी   


  
 

   


 

Tuesday, May 11, 2010

बहुत दिन तो नहीं पर साल का दूसरा दिन था जब मैंने अपनी एक पोस्ट में सभी हिंदी जानने वालों को बधाई दी थीमुझे यह कहते हुए बहुत ही अपसोस हो रहा है की अभी भी गोरखपुर जैसे शहरों के लोग जो बाहर रहते हैं वे अपने
ही शहर के बारे में कैसे कैसे विचार रखते हैं .मैंने यह देखा कि यहाँ के लोग ये सोचते हैं कि गोरखपुर बहुत पिछड़ा
शहर है . जबकि इसी शहर के वे भी हैं इस शहर से हर साल २-३ आइ ए एस  और पी सी एस और न जाने कितने
साहित्यकार व अन्य प्रतिभाएं निकलती हैं और वे इसे पिछड़ा मानते हैं .
आप लोगों को यह सोच बदलनी चाहिए

Monday, April 5, 2010

आज कल और कल

कब तक सहना है आदमी को 
जीवित लाशों के बीच 
वक्त कि सडन को 
फितरतों के जाल में 
इस मासूम से दिल को 
दिलासा देते हुए 
और नए से दिखते वादों 
पर विश्वास करते हुए 
आखिर कब तक